Monday, June 19

साधु कौन

जय सुदर्शन जय अरुण

'मुनि' शब्द 'साधु-परमेष्ठी' के लिये ही मुख्यतः प्रयुक्त हुआ है। 'णमोकार-महामंत्र' में पाँच-परमेष्ठियों के नाम में 'साधु' पद आया है।
"णमो लोए सव्वसाहूणं " किन्तु जब इन्हीं पंच-परमेष्ठियों के नामों के प्रथमाक्षरों से निष्पन्न 'ऊँ' या 'ओंकार' का विवरण आता है, तो वहाँ स्पष्ट लिखा है

"अरुहा-सिद्धायरिया उवज्झया तहा मुणिणो पढमक्खर-णिप्पण्णो, ओंकारो पंच-परमेट्ठी"

यहाँ 'साधु' की जगह 'मुनि' पद का प्रयोग यह बताता है कि पंच-परमेष्ठियों में 'साधु' और 'मुनि' पद को एकार्थक माना जाता है।
       
साधु का लक्षण:- आचार्य वीरसेन स्वामी 'धवला' ग्रंथ में लिखते हैं ।प्रवचनसार ग्रंथ की 'तात्पर्यवृत्ति' टीका में लिखा है,

रत्नत्रय-भावनया स्वात्मानं साधयतीति साधुः
 
अर्थात् जो रत्नत्रय की भावना से निजात्मतत्त्व को साधते हैं, वे 'साधु' हैं।

           
'पंचाध्यायी' (उत्तरार्द्ध) में लिखा है कि "जो केवल शुद्धात्मा में लीन होता हुआ वाग्व्यापार से भी विरत होकर निस्तरंग-समुद्र की भाँति शांत रहता है, परिषहों और उपसर्गों से जो पराजित नहीं होता, कामशत्रु को जीत लेता है, इत्यादि अनेक गुणों से युक्त साधु ही तत्त्वज्ञानियों के द्वारा नमस्कार किये जाने योग्य है, अन्य साधु नमस्कार के योग्य नहीं हैं।

यदि कोई साधु बाह्य मूलगुणों आदि धर्मों का संपूर्णतः पालन करता भी है, तथापि यदि उसे आत्मतत्त्व की रुचि नहीं है, तो वह सिद्धि को प्राप्त नहीं कर सकता है, बल्कि संसार में ही परिभ्रमण करता है।