प्रवचनामृत
जय गुरु सुदर्शन जय गुरु अरुण
हार से घबराए ना
आगम में दो तरह के श्रावको का जिक्र आता है।
एक तो दृढ़धर्मी :- चाहे कैसी भी परस्थिति हो अपने प्रण से पीछे मत हटना। उत्साह बनाकर रखना। निराशा के गले में नही पड़ना। कायरता का चौला नही पहनना।
दूसरी तरह के श्रावक होते है प्रियधर्मी :- जब हर तरह से अनुकूलता हो तब तो साधना के पथ पर बढ़ते है पर जब जरा सा कष्ट आ जाए तो ताए बाए हो जाते है, तनावग्रस्त हो जाते है।
पर मानव भयवश हमेशा दुविधा में रहता है कि में कार्य शुरू कर रहा हूँ कही हार न हो जाए। पता नही क्या होगा ? फिर हार के भी के कारण मन में निराशा व खीझ पैदा होती है।
क्रमश:
जय गुरु सुदर्शन जय गुरु अरुण
हार से घबराए ना
आगम में दो तरह के श्रावको का जिक्र आता है।
एक तो दृढ़धर्मी :- चाहे कैसी भी परस्थिति हो अपने प्रण से पीछे मत हटना। उत्साह बनाकर रखना। निराशा के गले में नही पड़ना। कायरता का चौला नही पहनना।
दूसरी तरह के श्रावक होते है प्रियधर्मी :- जब हर तरह से अनुकूलता हो तब तो साधना के पथ पर बढ़ते है पर जब जरा सा कष्ट आ जाए तो ताए बाए हो जाते है, तनावग्रस्त हो जाते है।
पर मानव भयवश हमेशा दुविधा में रहता है कि में कार्य शुरू कर रहा हूँ कही हार न हो जाए। पता नही क्या होगा ? फिर हार के भी के कारण मन में निराशा व खीझ पैदा होती है।
क्रमश: