जय गुरु सुदर्शन जय गुरु अरुण
ये सारी अपेक्षाए मुर्खता से भरी है तुम्हारा अंहकार कहता है, में कुछ हूँ सब मेरा साथ दे,पर आप स्वालम्बी बने नकि आलम्ब नकि खोज करे।
हार आत्मविश्वाश को स्वस्थ कर देती है बाहर की हार से तो शायद हम उभर जाए पर जब मन हार मान लेता है तो वो हार जीवन को अंदर ही अंदर बरबाद कर देती है। हार को मन पर हावी न होने दे। हम स्वयं पर ही हमला करके स्वयं को नष्ट करने में उलास हो जाते है।
एक शैतान ने अपने ओजारो जी सेल लगाने का मन बनाया।
क्रमश: